मूलनायक प्रतिमा

श्री 1008 शांतिनाथ, कुंथुनाथ व अरहनाथ भगवान

shantinath

पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में जैनधर्म के तीर्थंकर भगवान 1008 श्री शांतिनाथ कुंथुनाथ अरहनाथ की कायोत्सर्ग मुद्रा में अवस्थित भव्य प्रतिमाये है। इन प्रतिमाओं का अनिंद्य कला-सौष्ठव, भावाभिव्यन्जना और शिल्प-विधान अनुपम है। इनके दर्शन करते ही मन में आह्लाद, भक्ति और अध्यातम की पावन मन्दाकिनी प्रवाहित होने लगती है। भगवान शांतिनाथ कुंथुनाथ और अरहनाथ तीनो चक्रवर्ती थे तथा मनुष्य को उपलब्ध सम्पूर्ण सम्पदाके स्वामी थे। तीनों ही कामदेव थे, उन्हें अनिंद्य रूपछटा उपलब्ध थी। उनके अन्तःपुर में 96000 रानियाँ थी, मानो संसार-भर का समवेत रूप सौंदर्य वहीं एक स्थान पर आ जुटा हो । इस प्रकार उन्हें अनुपम रूप, भोग की सामग्री और भोग की शक्ति सब कुछ प्राप्त थी । किन्तु संसार के इन भोगो को क्षणिक जानकार उन्होंने संसार से विराग ले लिया और आत्मकल्याण की राह पर चल पड़े । उन्होंने निष्ठा, संकल्प और साधना के द्वारा अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया और वह शुद्ध बुद्ध सच्चिदानन्द परमात्मा बन गए। इन तीनो प्रतीमाओं की भावाभिव्यक्ति इन्हीं भावों को लेकर हुई है। प्रतिमाओं की मुख मुद्रा सौम्य और शांत है। साथ ही उनके ऊपर विराग की छवि स्पष्ट अंकित है । उनके मुख पर कामदेव की रूप-माधुरी है। उनके शरीर में लोक विजेता की शक्ति है। इसी शक्ति से उन्होंने कामदेव को विजित कर लिया था। इन्ही भावों का अंकन इन प्रतिमाओं पर हुआ है।मूलनायक शांतिनाथ भगवान की मूर्ति की अवगाहना 14 फुट 6 इंच है तथा पीठासनसहित इसका आकर 18 फुट है। इसके दायीं और बायीं ओर क्रमशः कुंथुनाथ और अरहनाथ की मूर्तियाँ हैं । यह दोनों भी खड्गासन प्रतिमाएं है। इनकी अवगाहना 10 फुट 9 इंच तथा पीठासन सहित 17 फुट है । शांतिनाथ भगवान के पीठासन पर मूर्ति का प्रतिष्ठा-काल 1236 फाल्गुन सुदी 6 उत्कीर्ण है । तीनों ही प्रतिमाओं पर घुंघराले कुंतल है। मुद्रा ध्यानमग्न है। अर्धोन्मीलित नयन, स्कंधचुम्बी कर्ण, गोलाकार मुख, पतले होंठों पर विरागरंजित स्मृति, चोड़ा वक्षस्थल और उसके मध्य में श्रीवत्स लांछन, क्षीण कटिभाग इन प्रतीमाओं का वैशिष्ट्य है । मुख पर तेज, लावण्य और शांति है । प्रतीमाओं के हाथ जंघो से मिले हुए नहीं है, पृथक है, हाथों पर कमल भी नहीं है, जैसे परवर्ती काल की ग्वालियर दुर्ग (गोपाचल पर्वत), पनिहार-बरई, सोनागिर आदि की विशाल मूर्तियों में उपलब्ध होते है। इन स्थानों की मूर्तियों के हाथों की हथेलियों पर अलग से कमल बने मिलते है । तीनों ही प्रतिमाओं की भुजाएँ जानुपर्यंत भी नहीं है, जैसा कि प्रायः खड्गासन तीर्थंकर-मूर्तियों में मिलती है । तीनो प्रतिमाओं के हाथों से नीचे पृथक-पृथक सौधर्मेन्द्र और उनकी शची हाथों में चमर लिए हुए खड़े है । इंद्र और इन्द्राणी दोनों विविध अलंकार धारण किये हुए है ।