आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी

आत्म विद्या के पथ-प्रदर्शक : जैनाचार्य विद्यासागर

आत्मविद्या के पथ-प्रदर्शक संत शिरोमणि जैनचार्य विद्यासागरजी आत्म-साधना के लिए निर्जन स्थलों को प्रश्रय देते हैं। आपकी मुद्रा भीड़ में अकेला होने का बोध कराती है। अकंप पद्मासन शांत स्वरूप, अर्धमीलित नेत्र, दिगम्बर वेश, आध्यात्मिक परितृप्ति-युक्त जीवन और निःशब्द अनुशासन जनसमूह के अंतर्मन को छुए बिना नहीं रहता। सभा मंडप में दुर्द्धर साधक की वाणी जब मुखरित होती है, तब निःशांति व्याप्त हो जाती है। श्रोता मंत्रमुग्ध हो श्रवण करते हैं। दृश्य समवशरण सा उपस्थित हो जाता है। आध्यात्मिक गुण-ग्रंथियाँ स्वतः खुलती चली जाती है। एक-एक वाक्य में वैदुष्य झलकता है। अध्यात्मी आचार्य कुंदकुंद और दार्शनिक आचार्य समन्तभद्र का समन्वय ‘प्रवचन’ में विद्यमान रहता है। आपके दर्शन से जीवन-दर्शन को समझा जा सकता है। जिनका मन आज के कतिपय साधुओं से खिन्न होकर ‘णमो लोए सव्व साहूणं’ से विरक्त हुआ है, वे एक बार सिर्फ एक बार लोक मंगलकारी, आत्मनिष्ठ विद्यासागरजी का सत्संग कर लें।

 दिगम्बर जैन आगम के अनुसार मुनिचर्या का पूर्णतः निर्वाह करते हुए परम तपस्वी विद्यासागरजी न किसी वाहन का उपयोग करते हैं, न शरीर पर कुछ धारण करते हैं। पूर्णतः दिगम्बर नग्न अवस्था में रहते हैं। पैदल ही विहार करते हैं। आपने सन्‌ 1971 से मीठा व नमक, 1976 से रस, फल, 1983 से जीवनभर पूर्ण थूकना, 1985 से बिना चटाई रात्रि विश्राम, 1992 से हरी सब्जियाँ व दिन में सोने का भी त्याग कर रखा है। खटाई, मिर्च, मसालों का त्याग किए 26 वर्ष हो चुके हैं। भोजन में काजू, बादाम, पिस्ता, छुवारे, मेवा, मिठाई, खोवा-कुल्फी जैसे व्यंजनों का सेवन भी नहीं करते। आहार में सिर्फ दाल, रोटी, दलिया, चावल, जल, दूध वो भी दिन में एक बार खड़गासन मुद्रा में अंजुलि में ही लेते हैं।

 कठोर साधक विद्यासागरजी ने बाह्य आडम्बरों-रूढ़ियों का विरोध किया है। आपका कहना है : कच-लुंचन और वसन-मुंचन से व्यक्ति संत नहीं बन सकता। संत बनने के लिए मन की विकृतियों का लुंचन-मुंचन करना पड़ेगा। मनुष्य श्रद्धा और विश्वास के अमृत को पीकर, विज्ञान-सम्मत दृष्टि अपनाकर सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और चरित्र का अवलंबन कर आत्मा के निकट जा सकता है, आत्मोद्धार कर सकता है, मोक्ष रूपी अमरत्व को पा सकता है। कोरा ज्ञान अहम पैदा करता है। जो व्यक्ति अपने लिए रोता है, वह स्वार्थी कहलाता है। लेकिन जो दूसरों के लिए रोता है, वह धर्मात्मा कहलाता है। धर्म को समझने के लिए सबसे पहले मंदिर जाना अनिवार्य नहीं है, बल्कि दूसरों के दुःखों को समझना अत्यावश्यक है। जब तक हमारे दिल में किसी को जगह नहीं देंगे, तब तक हम दूसरे के दुःखों को समझ नहीं सकते।

 आपकी स्पष्ट मान्यता है कि श्वेताम्बर-दिगम्बर दोनों समाज अल्पसंख्यक मान्यता, जीवदया के क्षेत्र में अंतर्मन से साथ-साथ काम करें। सभी मतभेद, मनभेद दूर करते हुए सुलझा लें। भगवान नेमिनाथजी के मोक्षस्थल के लिए सहयोग कर लें।

 श्रमण संस्कृति के उन्नायक संत के उद्बोधन, प्रेरणा, आशीर्वाद से अनेक स्थानों पर चैत्यालय, जिनालय, खिल चौबीसी, उदासीन आश्रम, स्वाध्याय शाला, औषधालय आदि जगह-जगह स्थापित किए गए हैं। शिक्षण के क्षेत्र में युवकों को राष्ट्र सेवा के लिए उच्च आदर्श युक्त नागरिक बनने की दृष्टि से भोपाल व जबलपुर में ‘प्रशासकीय प्रशिक्षण केंद्र’ सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं। अनेक विकलांग शिविरों में कृत्रिम अंग, श्रवण यंत्र, बैसाखियाँ, तीन पहिए की साइकलें वितरित की गई हैं। कैम्पों के माध्यम से आँख के ऑपरेशन, दवाइयाँ, चश्मों का निःशुल्क वितरण, रक्तदान जैसे प्रयास किए गए हैं। ‘भाग्योदय तीर्थ धर्मार्थ चिकित्सालय’, सागर में रोगियों का उपचार शाकाहार पर आधारित करने की प्रक्रिया निरंतर जारी है। 300 बिस्तर के इस चिकित्सा संस्थान द्वारा पिछले आठ वर्ष में दो बार विभिन्न बीमारियों के लिए निःशुल्क ऑपरेशन विदेशों से विशेषज्ञ चिकित्सकों को आमंत्रित करके किए जा रहे हैं। भोपाल में शीघ्र ही विद्यासागर मेडिकल कॉलेज स्थापित होने जा रहा है। दिल्ली में आईएएस, आईपीएस आदि की परीक्षा देने वाले युवाओं के लिए सर्वसुविधायुक्त छात्रावास निकट भविष्य में प्रारंभ होने जा रहा है। कई स्थानों पर शोध संस्थान चल रहे हैं।

 कन्नड़ भाषी होते हुए भी गहन चिंतक विद्यासागरजी ने प्राकृत, अपभ्रंश, संस्कृत, हिंदी, मराठी, बंगला और अँग्रेजी में लेखन किया है। आपके द्वारा रचित साहित्य में सर्वाधिक चर्चित कालजयी अप्रतिम कृति ‘मूकमाटी’ महाकाव्य है। इस कृति में आचार्यश्री को हिन्दी और संत साहित्य जगत में काव्य की आत्मा तक पहुँचा दिया है। यह रूपक कथा-काव्य, अध्यात्म दर्शन एवं युग चेतना का संगम है। इसके माध्यम से राष्ट्रीय अस्मिता को पुनर्जीवित किया गया है। इसका संदेश है : देखो नदी प्रथम है। निज को मिटाती खोती। तभी अमित सागा रूप पाती। व्यक्तित्व के अहम को। मद को मिटा दें। तू भी ‘स्व’ को सहज में। प्रभु में मिला दे। देश के 300 से अधिक साहित्यिकारों की लेखनी मूक माटी को रेखांकित कर चुकी है, 30 से अधिक शोध/लघु प्रबंध इस पर लिखे जा चुके हैं।

 महाश्रमण विद्यासागरजी जल के सदृश निर्मल, प्रसन्न रहते हैं, मुस्कराते रहते हैं। तपस्या की अग्नि में कर्मों की निर्जरा के लिए तत्पर रहते हैं। सन्मार्ग प्रदर्शक, धर्म प्रभावक आचार्यश्री में अपने शिष्यों का संवर्धन करने का अभूतपूर्व सामर्थ्य है। आपके चुम्बकीय व्यक्तित्व ने युवक-युवतियों में आध्यात्म की ज्योत जगा दी है।

 साहित्य मनीषी, ज्ञानवारिधि जैनाचार्य प्रवर ज्ञानसागरजी महाराज के साधु जीवन व पांडित्य ने आपको अत्यधिक प्रभावित किया है। गुरु की कसौटी पर खरा उतर गए, इसलिए आषाढ़ शुक्ल पंचमी, रविवार 30 जून 1968 को राजस्थान की ऐतिहासिक नगरी, अजमेर में लगभग 22 वर्ष की आयु में संसार की समस्त बाह्य वस्तुओं का परित्याग कर दिया। संयम धर्म के परिपालन हेतु आपको गुरु ज्ञानसागरजी ने पिच्छी-कमण्डल प्रदान कर ‘विद्यासागर’ नाम से दीक्षा देकर संस्कारित किया और उनका शिष्यत्व पाने का सौभाग्य प्राप्त हो गया।

 ज्ञात इतिहास की वह संभवतः पहली घटना थी, जब नसीराबाद (अजमेर) में ज्ञानसागरजी ने शिष्य विद्यासागरजी को अपने करकमलों से बुधवार 22 नवंबर १९७२ को अपने जीवनकाल में आचार्य पद का संस्कार शिष्य पर आरोपण करके शिष्य के चरणों में नमन कर उसी के निर्देशन में समाधिमरण सल्लेखना ग्रहण कर ली हो।

 22 वर्ष की आयु में संत शिरोमणि विद्यासागरजी का पहला चातुर्मास अजमेर में हुआ था। 39वाँ वर्षायोग ससंघ 44 मुनिराजों के साथ इस वर्ष अमरकंटक (मध्यप्रदेश) में संपन्न होने जा रहा है। अब तक आपने 79 मुनि, 165 आर्यिका, 8 ऐलक, 5 क्षुल्लक सहित 257 दीक्षाएँ प्रदान की हैं। यह जैन श्रमण-परम्परा के ज्ञात इतिहास में प्रथम संघ है, जिसमें आचार्य द्वारा दीक्षित सभी शिष्य, साधुगण, आर्यिकाएँ, बाल ब्रह्मचारी-बाल ब्रह्मचारिणी हैं। आप पूरी निष्ठा से गुरु ज्ञानसागरजी के पद चिन्हों पर चल रहे हैं। आपमें आचार्य पद के सभी गुण विद्यमान हैं। हजार से अधिक बाल ब्रह्मचारी-बाल ब्रह्मचारिणी आपसे व्रत-प्रतिमाएँ धारण कर रत्नत्रय धर्म का पालन कर रहे हैं। जैन समाज संख्या की दृष्टि से सबसे अधिक साधना और अनुशासित मुनि संघ के संघ नायक आचार्य आप ही हैं। घड़ी के काँटे से नित्य-नियम का पालन करते हैं।

करुणावंत विद्यासागरजी की पक्की धारणा है कि भारत को दया के क्षेत्र में सक्रिय होना ही चाहिए। यदि हम संकल्प कर लें कि देश से मांस निर्यात नहीं होने देंगे तो क्या मजाक कि सरकार जनभावना का अनादर कर सके। पशुओं का वध बिना मौत आए किया जा रहा है। सरकार ने कत्लखाने खोलकर, अनुदान देकर, खून बहाकर, मांस बेचकर, चमड़ा निर्यात करके, पशुओं के कत्ल को कृषि उत्पादन की श्रेणी में रख दिया है। हिंसा को व्यापार का रूप प्रदान कर रखा है।

 ऐसी नीति से आप ईश्वर की प्रार्थना करने के काबिल नहीं हो सकते। अहिंसा की उपासना वाले राष्ट्र में कत्लखानों की क्या आवश्यकता है? ईश्वर की उपासना हिंसा-कत्ल से घृणा सिखाती है। सभी जीवों को जीने का संदेश देती है। प्रेम, स्नेह, वात्सल्य सिखाती है। ये कत्लखाने धर्म का अपमान हैं। कोई भी धर्म हिंसा को अच्छा नहीं मानता और न ही इसका समर्थन करता है। कत्लखानों से बच्चों को क्या सीख मिलेगी?

जिस यायावर संत, निर्मल अनाग्रही दृष्टि, तीक्ष्ण मेघा, स्पष्ट वक्ता के समक्ष व्यक्ति स्वतः नतशिर हो जाता है, उन महाव्रती विद्यासागरजी का जन्म कर्नाटक प्रांत के बेलगाँव जिले के ग्राम सदलगा के निकटवर्ती गाँव चिक्कोडी में 10 अक्टूबर 1946 की शरद पूर्णिमा को गुरुवार की रात्रि में लगभग 12:30 बजे हुआ था। श्रेष्ठी मल्लप्पाजी अष्टगे तथा माता श्रीमती श्रीमंति अष्टगे के आँगन में विद्यासागर का घर का नाम ‘पीलू’ था। जहाँ आप विराजते हैं, वहाँ तथा जहाँ अनेक शिष्य होते हैं, वहाँ भी आपका जन्म दिवस नहीं मनाया जाता। तपस्या आपकी जीवन पद्धति, आध्यात्म साध्य, विश्व मंगल आपकी पुनीत कामना व सम्यक दृष्टि व संयम आपका संदेश है। आप वीतराग परमात्मा पद के पथ की ओर सतत अग्रसर रहें, ऐसी पावन कामना के साथ राष्ट्रसंत के चरण कमल में मन-वचन-काय से कोटिशः नमोस्तु….नमोस्तु….नमोस्तु…..

निर्मल कुमार पाटोदी
विध्यानिलय 45 शांति निकेतन
पिन कोड : 452010 इन्दौर
मूललेख एवं आचार्यश्री के बारे में
अधिक जानकारी के लिए देखे www.vidyasagar.net

आचार्य श्री विद्यासागर जी की साहित्य साधना:

संस्कृत शतकम् हिन्दी काव्य स्तुति सरोज हिन्दी शतक
शारदा स्तुति शतकम् मूकमाटी महाकाव्य आचार्य शांतिसागर स्तुति निजानुभाव शतक
श्रमण शतकम् नर्मदा का नरम कंकर आचार्य वीरसागर स्तुति मुक्तक शतक
निरंजन शतकम् डूबो मत, लगाओ डूबकी आचार्य शिवसागर स्तुति श्रमण शतक
भावना शतकम् तोता क्यों रोता? आचार्य ज्ञानसागर स्तुति निरंजन शतक
परीषहजम शतक चेतना के गहराव में। आध्यात्म-7 भक्तिगीत भावना शतक
सुनीति शतकम्     परीषहजय शतक
चेतन्यचन्द्रोदय शतकम्     सुनीति शतक
धीवरोदय शतकम्     दोहादोहन शतक (मंगल कामना)
      पूर्णोदय शतक
      सूर्योदय शतक
      सर्वोदय शतक
चरित्र भक्ति
कुन्दकुन्द का कुन्दन (समयसार) निजामृतपान अष्टपाहुड भावना शतकम् (समयसार कलश) नियमासार
वारस अणुवेक्खा पंचास्तिकाय इष्टोपदेश (वसंततिलका छन्द) प्रवचनसार समाधिसुधाशतक (समाधिकशतक)
नव भक्तियाँ (आचार्य पूज्यपादकृत) समंतभद्र की भद्रता(स्वयम्भू स्त्रोत्र) रयणमंजूषा (रत्नकरडक श्रावकाचार) आप्त मीमांसा (देवागम स्त्रोत्र) द्रव्य संग्रह ( वसंततिलका छन्द)
गोमटेश अष्टक् योगसार आप्त परीक्षा जैन गीता(समण सुतं) कल्याण मन्दिर स्तोत्र
एकीभाव स्तोत्र जिनेन्द्र स्तुति स्वरूप संबोधन ष्टोपदेश (ज्ञानोदय) द्रव्य संग्रह

आचार्य श्री विद्यासागर जी के द्वारा प्रभावक कार्य

  • मूकमाटी मीमांसा (भाग 1,2,3) लगभग 325 संस्कृत, हिन्दी, जैन जैनतर विद्वानों के लेख तथा भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित।
  • मूकमाटी पर शाताधिक पी.एच.डी,/डी.लिट., एम.फिल आदि।
  • आचार्य श्री का साहित्य अनेकों महाविद्यालयों में पाठ्यक्रम में शामिल।
  • जबलपुर-जयपुर ट्रेन का नाम “दयोदय एक्सप्रेस” हुआ।
  • नव निर्माण श्री समवशरण दि. जैन मन्दिर, सिलवानी, जिला- रायसेन (म.प्र.)
  • श्री दि. जैन सिद्ध कुंडलपुर, जिला-दमोह(म.प्र.)
  • श्री नन्दीश्वर दीप पिसनहारीजी मढिया जी, जबलपुर (म.प्र.)
  • श्री शांतिनाथ दिगम्बर (चौबीसी एवं पंचबालयति) जैन मन्दिर, रामटेक, जिला-नागपुर (महाराष्ट्र)
  • श्री सिद्धोदय सिद्ध क्षेत्र, नेमावर, तह. खातेगांव, जिला-देवास(म.प्र.)
  • श्री “सर्वोदय तीर्थ” दि. जैन मन्दिर अमरकंटक, जिला – अनूपपुर (म.प्र.)
  • श्री “भाग्योदयतीर्थ” (मानव सेवा एवं शिक्षा) फार्मेसी कॉलेज, नर्स कॉलेज, सागर (म.प्र)
  • श्री शांतिनाथ दि. जैन मन्दिर अतिशय क्षेत्र, बीनाबारह, जिला- देवरी, सागर (म.प्र.)
  • श्री दि. जैन समवशरण “शीतलधाम, हीरापुरा” विदिशा (म.प्र.)
  • श्री दि. जैन चौबीसी मन्दिर, टडा, जिला-सागर (म.प्र.)
  • श्री दयोदय तीर्थ एवं प्रतिभा स्थली (शिक्षा संस्कार के लिए) तिलवारा घाट, जबलपुर (म.प्र.)
  • भारतवर्षीय प्रशासकीय प्रशिक्षण संस्थान (विभिन्न पदों की कोचिंग), जबलपुर (म.प्र.)
  • आचार्य श्री विद्यासागर जी ‘शोध संस्थान’ भोपाल (म.प्र.)
  • सुप्रीम कोर्ट से 7 जजों के बैंच से ऐतिहासिक गौ वध पर प्रतिबन्ध का फैसला हुआ।
  • बैलों की रक्षा एवं गरीबों को रोजगार हेतु “दयोदय जहाज” का गंजबासौदा एवं विदिशा में वितरण।
  • मध्यप्रदेश सरकार द्वारा पूरे म.प्र. में ‘आचार्य विद्यासागर जी गौ दान योजना’ लागू।
  • संस्थायें-

  • “ब्राही विद्या आश्रम” मढिया जी जबलपुर (म.प्र.)
  • vidyasagar.net इस वेबसाइट पर सभी जानकारी उपलब्ध।

40 से अधिक पंचकल्याणक, अनेकों विधान आदि, कुंडलपुर के बडे बाबा का नये मन्दिर मे विहार (जैन समाज ऐतिहासिक कार्य) उपराष्ट्रपति श्री भैरोसिंह शेखावत से अमरकंटक में चर्चा, प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी से गोमटगिरि, इन्दौर में चर्चा, केन्द्रीय मंत्री श्रीमती मेनका गाँधी से जबलपुर में चर्चा, अनेकों मुख्यमंत्रियों से चर्चा, श्री दिग्विजय सिंह, सुश्री उमा भारती, श्री शिवराज सिंह चौहान, श्री सुन्दरलाल पटवा, श्री बाबूलाल गौर आदि से चर्चा, श्री ज्योतिरादित्य सिंधिया से चर्चा विदिशा में, विधानसभा अध्यक्ष श्री ईश्वरदास रोहाणी से चर्चा, राजस्थान के राज्यपाल श्री निर्मल चन्द्रजी जैन (जबलपुर) से चर्चा एवं अनेकों केन्द्रीय मंत्री, मुख्यमंत्री, राज्यमंत्री, सुप्रीम कोर्ट के जजों, हाईकोर्ट के जजों, आयोग अध्यक्षों एवं विशिष्ट पदों वाले व्यक्तियों से चर्चा के दौरान अनेक धार्मिक प्रभावना के कार्य हुए और अनेकों संतों जैसे योग गुरु बाबा रामदेव से आचार्य श्री की चर्चा, दयोदय तीर्थ गौशाला, जबलपुर में हुई थी।आपके सान्निध्य में 20वीं शताबदी में षट्खण्डागम तथा कषायपाहुड ग्रंथ की वाचना प्रारम्भ हुई है।

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के सान्निध्य में सम्पन्न हुई सल्लेखनायें:

  • 20 सल्लेखनायें
  • 30 समाधी मरण

1 आचार्य, 3 मुनि, 2 आर्यिका, 2 ऐलक, 6 क्षुल्लक, 3 क्षुल्लिका और अन्य व्रती, प्रतीभाधारी श्रावक जनों की सल्लेखना सम्पन्न हुई।

दीक्षा समारोह

आषाढ़ सुदी 5 वि.सं. 2025, तदनुसार 30 जून 68 का दिन। शहर अमजेर। स्थान सोनीजी की नसिया। सूर्य की प्रथम किरण नृत्य कर रही है। अभी-अभी बाल अरुण ने नेत्र खोले हैं। मठ, मढ़िया, मंदिर, नसिया, चैत्यालय मुस्करा रहे हैं। उनके गर्भ से गूँजती पीतल के घंटों की आवाजें कोई संदेश बार-बार दोहरा रही हैं। देवालयों के बाहरी तरफ कहीं सिंहपौर के समीप श्यामपट्ट पर खड़िया से लिखा गया समाचार आज भी चमक रहा है। जिसे कल सारा नगर पढ़ चुका था, उसे आज फिर वे ही लोग पढ़ रहे हैं। कुछ स्थानों पर हार्डबोर्ड पर लिखकर टाँगा गया है। वही समाचार। नगर के समस्त दैनिकों ने समाचार छापकर अपना विनम्र प्रणाम ज्ञापित किया है योगियों के चरणों में। कुछ प्रमुख अखबार ब्रह्मचारी विद्याधर का चित्र भी छाप पाने में सफल हो गए हैं। अनपढ़ों से लेकर पढ़े-लिखे तक समाचार सुन-पढ़कर चले आ रहे हैं नसिया के प्रांगण में। धनिक आ रहे हैं। मनीषी आ रहे हैं। हर खास आ रहा है। हर आम आ रहा है। कर्मचारी-अधिकारी एक साथ आ रहे हैं। परिवारों के झुण्ड समाते जा रहे हैं पांडाल में। नारियों का उत्साह देखने लायक है, वे अपनी अति बूढ़ी सासों तक को साथ में लाई हैं। बच्चों का जमघट हो गया है। सभी के कान माइक से आती आवाजों पर बार-बार चले जाते हैं। पूर्व घोषणा के अनुसार आज परम पूज्य गुरु श्री ज्ञानसागरजी महाराज अपने परम मेधावी, परम-तपस्वी शिष्य, युवा योगी, ब्रह्मचारी श्री विद्याधरजी को जैनेश्वरी दीक्षा प्रदान करेंगे। बोलिए-गुरु ज्ञानसागर की —जय। बोलिए- युवा तपस्वी ब्रह्मचारी विद्याधर की —जय।

सोनीजी की नसिया के प्रांगण में भगवान महावीर के समवशरण जैसा दृश्य बन गया है। मंच लंबा-चौड़ा है, ऊँचा है। मंच के सामने जनसमुदाय है। जनसमुदाय के समक्ष मंच पर एक ऊँचे सिंहासन पर गुरुवर श्री ज्ञानसागरजी विराजित हैं, साथ ही क्षुल्लकश्री सन्मतिसागरजी, क्षुल्लकश्री संभवसागरजी, क्षुल्लकश्री सुखसागरजी एवं संघस्थ अन्य ब्रह्मचारी भी आसीन हैं।

उनके कुछ ही दूरी पर ब्र. विद्याधर बैठे हैं। समीप ही शहर के श्रेष्ठी विद्वान, गुणीजन बैठे हैं। सर सेठ भागचंद सोनी, प्राचार्य निहालचंद जैन, श्री मूलचंद लुहाड़िया, श्री दीपचंद पाटनी एवं श्री कजौड़ीमल सरावगी को दूर से ही पहचाना जा सकता है।

दीक्षा समारोह प्रारंभ

दीक्षा समारोह प्रारंभ होता है। ब्र. विद्याधर खड़े होकर गुरुवर की वंदना करते हैं, हाथ जोड़कर दीक्षा प्रदान करने की प्रार्थना करते हैं। गुरुवर का आदेश पाकर विद्याधर वैराग्यमयी, सारगर्भित वचनों से जनता को उद्बोरधन देते हैं तदुपरान्त विद्याधर ने हवा में उड़ने वाले केशों का लुन्चा करना प्रारंभ कर दिया। अपनी ही मुष्टिका में सिर से इतने सारे बाल खींच ले जाते कि देखने वाले आह भर पड़ते हैं। फिर दूसरी मुष्टिका। तीसरी। फिर सिर के बाल निकालते हुए कुछ स्थानों से रक्त निकल आया है। विद्याधर के चेहरे पर आनंद खेल रहा है। हाथ आ गए दाढ़ी पर। दाढ़ी की खिंचाई और अधिक कष्टकारी होती है। वे दाढ़ी के बाल भी उसी नैर्मम्य से खींचते हैं। हाथ चलता जाता है, बाल निकलते जाते हैं, पूरा चेहरा लहूलुहान हो गया है। श्रावक सफेद वस्त्र ले उनकी तरफ दौड़ पड़ते हैं। वे अपने चेहरे को छूने नहीं देते। बाल खींचते जाते हैं। रक्त बहता जा रहा है। विद्याधर जहाँ के तहाँ / अविचलित खुश हैं। आनन्दमय हैं। केश लुन्च पूर्ण होते ही पंडितों-श्रावकों और अपार जनसमूह के समक्ष गुरु ज्ञानसागरजी संस्कारित कर उन्हें दीक्षा प्रदान करते हैं। विद्याधर वस्त्र छोड़ देते हैं दिगम्बरत्व धारण कर लेते हैं। तभी एक आश्चर्यकारी घटना घटी। राजस्थान की जून माह की गर्मी और खचाखच भरे पांडाल में 20-25 हजार नर-नारी। समूचे प्रक्षेत्र पर तेज उमस हावी थी। लोग पसीने से नहा रहे थे। वातावरण ही जैसे भट्टी हो गया हो। जैसे ही विद्याधर ने वस्त्र छोड़े, पता नहीं कैसे कहाँ से बादल आ गए और पानी की भीनी-भीनी बौछार होने लगी, हवाएँ ठंडी हो पड़ी, वातास शांति एवं ठंडक अनुभव करने लगा। ऐसा लगा कि प्रकृति साक्षात् गोमटेश्वरी दिगम्बर मुद्रा का महामस्तकाभिषेक कर कर रही हो अथवा देवों सहित इन्द्र ने ही आकर प्रथम अभिषेक का लाभ लिया हो। कुछ समय बाद पानी रुक गया। सूर्य ने पुनः किरणें बिखेर दीं। सभी दंग रह गए, कहने लगे यह तो महान पुण्यशाली विद्यासागरजी की ही महिमा है। सभी अपने-अपने मनगढ़ंत भाव लगाकर विद्याधर के पुण्य का बखान कर रहे थे। वहीं छोटे बालक कह रहे थे विद्याधर ने जैसे ही धोती खोली वैसे ही इन्द्र का आसन काँप गया सो उसने खुशी जताने के लिए नाच-नाचकर यह वर्षा की है। ज्ञानसागरजी पिच्छी कमण्डल सौंपते हैं और मुनिपद को संबंधित निर्देश देते हैं। दीक्षा संपन्न।

आचार्यश्री विद्यासागरजी के संयमित जीवन के आचार्यश्री शांतिसागरजी और आचार्यश्री ज्ञानसागरजी, दो स्वर्णिम तट हैं। एक ने उनके जीवन में धर्म का बीज बोया तो दूसरे ने उसे पुष्पित/पल्लवित कर वृक्ष का आकार प्रदान किया। आचार्यश्री शांतिसागरजी की सारस्वत आचार्य परम्परा में आचार्य शिवसागरजी के उपरान्त जब आचार्य गुरुवर ज्ञानसागरजी ने श्रमण संस्कृति धर्म एवं समाज को उत्कर्ष तक पहुँचाने के उद्देश्य से अपने ही द्वारा शिक्षित/दीक्षित मुनि विद्यासागर को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया तो विद्यासागरजी अवाक्‌ रह गए और अपनी असमर्थता जाहिर की।

आचार्य महाराज ने कुछ सोचकर कहा कि “देखो अंतिम समय आचार्य को अपने पद से मुक्त होकर, अन्य किसी संघ की शरण में, सल्लेखनापूर्वक देह का परित्याग करना चाहिए। यही संयम की उपलब्धि है और यही आगम की आज्ञा भी है। अब मैं इतना समर्थ नहीं हूँ कि अन्यत्र किसी योग्य आचार्य की शरण में पहुँच सकूँ, सो मेरे आत्मकल्याण में तुम सहायक बनो और आचार्य-पद संभालकर मेरी सल्लेखना कराओ। यही मेरी भावना है”। विद्यासागरजी को गुरुदक्षिणा के रूप में आचार्य पद ग्रहण करने की स्वीकृति अपने गुरु को देना ही पड़ी।

आचार्य पद

22 नवंबर 1972 को नसीराबाद, राजस्थान में गुरु आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज ने आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने आचार्य विद्यासागर जी को आचार्य पद दिया। तब आचार्य ज्ञानसागर जी ने संबोधित कर कहा को साधक को अंत समय में सभी पद का परित्याग आवश्यक माना गया है। इस समय शरीर की ऐसी अवस्था नहीं है कि मैं अन्यत्र जा कर सल्लेखना धारण कर सकूँ। तुम्हें आज गुरु-दक्षिणा अर्पण करनी होगी और उसी के फलस्वरूप यह पद धारण करना होगा। गुरु-दक्षिणा की बात से मुनि विद्यासागर निरुत्तर हो गये। तब धन्य हुई नसीराबाद(अजमेर) राजस्थान की वह घडी जब मगसिर कृष्ण द्वितीय, संवत 2029, बुधवार, 22 नवम्बर ,1972 ईस्वी को आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने अपने ही कर कमलों से आचार्य पद पर मुनि श्री विद्यासागर महाराज को संस्कारित कर विराजमान किया। इतना ही नहीं मान मर्दन के उन क्षणों को देख कर सहस्त्रों नेत्रों से आँसूओं की धार बह चली जब आचार्य श्री ज्ञानसागर जी ने मुनि श्री विद्यासागर महाराज को आचार्य पद पर विराजमान किया एवं स्वयं आचार्य पद से नीचे उतर कर सामान्य मुनि के समान नीचे बैठ कर नूतन आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के चरणों में नमन कर बोले – ” हे आचार्य वर! नमोस्तु, यह शरीर रत्नत्रय साधना में शिथिल होता जा रहा है, इन्द्रियाँ अपना सम्यक काम नहीं कर पा रही हैं। अतः आपके श्री चरणों में विधिवत सल्लेखना पूर्वक समाधिमरण धारण करना चाहता हूँ, कृपया मुझे अनुगृहित करें”। आचार्य श्री विद्यासागर ने अपने गुरु की अपूर्व सेवा की। पूर्ण निमर्मत्व भावपूर्वक आचार्य ज्ञानसागर जी मरुभूमि में वि. सं. 2030 वर्ष की ज्येष्ठ मास की अमावस्या को प्रचंड ग्रीष्म की तपन के बीच 4 दिनों के निर्जल उपवास पूर्वक नसीराबाद (राज.) में ही शुक्रवार, 1 जून 1973 ईस्वी को 10 बजकर 10 मिनट पर इस नश्वर देह को त्याग कर समाधिमरण को प्राप्त हुए।

चातुर्मास

  • 1968 – अजमेर, राजस्थान
  • 1969 – अजमेर, राजस्थान
  • 1970 – अजमेर, राजस्थान
  • 1971 – अजमेर, राजस्थान
  • 1972 – अजमेर, राजस्थान
  • 1973 – अजमेर, राजस्थान
  • 1974 – अजमेर, राजस्थान
  • 1975 – फिरोजाबाद
  • 1976 – कुण्डलपुरपुर, मध्यप्रदेश
  • 1977 – कुण्डलपुरपुर, मध्यप्रदेश
  • 1978 – नैनागिर
  • 1979 – थुबौनजी
  • 1980 – मुक्तागिरी
  • 1981 – नैनागिर
  • 1982 – नैनागिर
  • 1983 – ईसरी
  • 1984 – जबलपुर
  • 1985 – टीकमगढ
  • 1986 – टीकमगढ
  • 1987 – थुबौनजी
  • 1988 – जबलपुर
  • 1989 – कुण्डलपुर
  • 1990 – मुक्तागिर
  • 1991 – मुक्तागिर
  • 1992 – कुण्डलपुर
  • 1993 – रामटेक
  • 1994 – रामटेक
  • 1995 – कुण्डलपुर
  • 1996 – महुआ
  • 1997 – देवास
  • 1998 – सागर
  • 1999 – इंदौर
  • 2000 – अमरकंटक
  • 2001 – जबलपुर
  • 2002 – नेमावर
  • 2003 – अमरकंटक
  • 2004 – जबलपुर
  • 2005 – बीनावारह
  • 2006 – अमरकंटक
  • 2007 – बीनावारह
  • 2008 – रामटेक
  • 2009 – अमरकंटक
  • 2010 – बीनावारह
  • 2011 – डोंगरगढ़
  • 2012 – डोंगरगढ़
  • 2013 – विदिशा
  • 2014 – नेमावर