तीर्थ से महातीर्थ की यात्रा

तीर्थ परिचय

इस क्षेत्र की स्थापना दिगम्बर जैन आचार्य परम पूज्य कुन्दकुन्द स्वामीजी की अम्याना अनुसार 12 वीं शताब्दी में की गयी थी। यह मंदिर दिगंबर जैन तीर्थक्षेत्र श्रेष्ठी पाड़ाशाह द्वारा 12 वी शताब्दी में निर्मित किया गया था। यह क्षेत्र पूर्णतः दिगंबर जैन तेराह्पंथी आम्न्या का क्षेत्र है । संत शिरोमणि आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज एवं उनके परम शिष्य मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के आशीर्वाद एवं प्रेरणा से सन 1992 में प्रतिमाओं का जीर्णोद्वार किया गया था एवं आपके अतिशयकारी आशीर्वाद व मंगलमयी प्रेरणा से इस क्षेत्र का बहुमुखी विकास नन्दीश्वर द्वीप, समवशरण, त्रिकाल चौबीसी, विद्यासागर संतशाला, सुधासागर अतिथिनिलय, आहार शाला की स्थापना कुन्दकुन्द मूल आम्याना अनुसार 2013 में की गई।

जिला मुख्यालय से 7 किलोमीटर की दूरी पर चौपेट नदी है। इसी के किनारे जैनधर्म के तीर्थंकर भगवान 1008 श्री शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरनाथ का भव्य चमत्कारिक जिनालय स्थित है। मंदिर में मूलनायक के रूप में 18 फिट ऊंची भगवान शांतिनाथ की प्रतिमा कायोत्सर्ग मुद्रा में विराजित हैं। यहां एक दो नहीं बल्कि कई आश्चर्यचकित कर देने वाले चमत्कार हुए हैं। जिनका इतिहास जानने पर पता चलता है कि यह नि:संदेह देवकृत अतिशय ही थे। चाहे वह लोहे का सोना बन जाना हो, या फिर जल के लिए शापित शहर में जलधारा निकलना हो, या फिर आतातायी शक्तियों के ऊपर अग्रिवर्षा हो या फिर देवो द्वारा मंदिर के माली को मंदिर से उठाकर बाहर करना हो या यों कहें कि रात के समय घुघंरू, झालर का संगीत सुनाई देना हो आदि- आदि यह घटनाएं देवकृत ही मालूम होती हैं। इनका वर्णन आगे आपको मिलेगा।

पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नगर में मस्तक पर लगे हुए सौभाग्य-बिंदु की तरह अब भी आकाश में जयध्वज लहराता हुआ खड़ा है। उसके आकाशचुम्बी श्वेत शिखरों पर स्वर्ण कलश सूर्य की खिलती धूप में अब भी अपना तेज चारों और विकीर्ण कर रहे है।

बजरंगगढ़ में तीर्थक्षेत्र के ठीक सामने नदी के उस पार भव्य किला बना हुआ है। जो करीबन एक हजार वर्ष पुराना माना जाता है। इस किले का जीर्णोद्वार शासन द्वारा करीबन 2 करोड़ रुपए की लागत से कराया जा रहा है। किले में पार्क है। जो क्षेत्र के लिए एक बड़ा पिकनिक स्पॉट भी बन गया है।

दर्शन करने मात्र से कट जाते हैं जन्मान्त्तरो के पापकर्म

यहां विराजित त्रिपदधारी भगवान श्री शांतिनाथ, श्री कुंथनाथ, श्री अरनाथ जी की प्रतिमाएं मनोहारी और और अतिशयकारी हैं। 18 फिट ऊंचाई के खड्गासन जिनबिंब जिनके दर्शन करने मात्र से भव्य जीवों के जन्म -जन्मातरों के पाप कर्म, भव -भवांतरों के पाप कर्म क्षय को प्राप्त होते हैं। जो भी भक्त इन मनोहारी पाषाण निर्मित जिनबिंबो के दर्शन करता है उसका संसार समुद्र सूखकर चुल्लू भर पानी के समान रह जाता है। यह कहने की जरूरत नहीं है कि वह निकट भव्य बन मोक्ष मार्ग की ओर आगे बढ़ता है।

प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी है बजरंगगढ़ (गुना)

प्राचीन अवंती (आज का उज्जैन) महाजनपद का हिस्सा रहा। हमारे गुना ने कई उतार चढ़ाव देखे हैं। अवंतिका के बाद उभरते हुए मगध साम्राज्य में शामिल होने पर क्षेत्र का बहुत ऐतिहासिक विकास हुआ। 18वीं शताब्दी की शुरुआत में मराठा राजा रामोजीराव सिंधिया ने गुना को जीत लिया। 1847 की लड़ाई के बाद गुना, ग्वालियर के साथ राघौगढ़ के नियंत्रण में आ गया। 1860 में अंग्रेजों ने गुना को अपनी छावनी बनाया और यहां एक असिस्टेंट आफिसर की नियुक्ति कर दी। यद्यपि गुना ग्वालियर राज्य का हिस्सा था लेकिन यहां ब्रिटिश छावनी होने से डिस्ट्रिक हैडक्वाटर के रूप में बजरंगढ़ को विकसित किया गया।

प्राचीनता का इतिहास

मंदिर में मौजूद शिलालेखों से ज्ञात होता है कि यह क्षेत्र सैकड़ों वर्ष प्राचीन है। जहां 12वीं शताब्दी की सभ्यता, कलाकृति मौजूद हैं। यह क्षेत्र प्राचीनता, रमणीयता और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए पूर्व से ही प्रसिद्ध रहा है।

यहां त्रिपदधारी यानी तीर्थंकर, कामदेव और चक्रवर्ती इन तीनों पदों को धारण करने वाले तीनों तीर्थंकर भगवान श्री शांतिनाथ, श्री कुंथुनाथ, श्री अरनाथ जी की प्रतिमाएं कायोत्सर्गमुद्रा में विराजमान हैं। पाड़ों की सहायता से व्यापार करने वाले सेठ पाड़ाशाह के साथ इसी जगह पर एक चमत्कारिक घटना घटी थी। जिसमें उनके पाड़े के गले में पड़ी लोहे की सांकल सोने में तब्दील हो हुई थी। मालूम हुआ कि यहां पारस पत्थर है। अपने गुरुओं से इस बात का रहस्य जानने के बाद सेठ पाड़ाशाह ने यहां भव्य जिनालयों का निर्माण कराया। जिनकी प्रतिष्ठा सेठ पाड़ाशाह ने अपने गुरु गुणधर आचार्य के द्वारा फाल्गुन सुदी 6 विक्रम संवंत 1236 को कराई थीं। उस समय इस क्षेत्र का नाम जैनागढ़ था। जहां जैन समाज की बढ़ी संख्या निवास करती थी उस समय तकरीबन 200 घर जैन समाज के थे। जो अब धीरे- धीरे शहर की ओर पलायन कर गए हैं।

आखिर गर्त में क्यों चला गया था क्षेत्र

ज्यों – ज्यों यहां से जैनियों की संख्या कम हुई वैसे वैसे यहां विकास के कार्य अवरूद्व होते चले गए और ऐतिहासिक नगरी बजरंगगढ़ जो अंग्रेजी शासनकाल में कभी जिले का दर्जा पा गई थी वह रुतवा धीरे- धीरे खोने लगी। हालात यह बने कि यहां भक्तों की संख्या तेजी से कम होने लगी। इस दौरान कई बार चमत्कारिक घटनाएं यहां हुई जिनका वर्णन आगे विस्तार से दिया गया है।

ऐसा प्रतीत होता है कि समय, काल और परिस्थितियों के वशीभूत होकर हमारे पूर्वजों ने मूलनायक भगवान को गुफा के आकार के मंदिर में स्थापित किया होगा। क्योंकि मुगलकाल में मुगल शासकों द्वारा हमारी धरोहरों पर बहुत अधिक कुठाराघात किया। मूलनायक भगवान को क्षति पहुंचाने की कोशिश हुई लेकिन देव रक्षित होने से षडय़ंत्रकारी कोई बड़ा नुकसान नहीं पहुंचा पाए हालांकि कुछ अंगों को चोट पहुंची। शीश पर कुछ हल्का प्रहार तो अधर के नीचे भी क्षति पहुंचाई गई। कमेटी लंबे समय से हर तरह का समूचित प्रयास करते चले आ रही थी लेकिन क्षेत्र फिर भी कोई खास तरक्की नहीं कर पा रहा था। यहां निरंतर भक्तों की संख्या घटती चली गई। जानकार मानते हैं कि मूलनायक भगवान की दृष्टि बाधित होने से यह बड़ा दोष आया होगा। जिसकी वजह से क्षेत्र उत्तरोत्तर उन्नति नहीं कर सका।

मुनिश्री ने कराया वर्ष 1992 में प्रतिमाओं का जीर्णोद्वार

मूलनायक भगवान की पाषाण प्रतिमाओं में क्षरण होना शुरू हो गया था। इसी दौरान आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के परम आज्ञानुवर्ती शिष्य, तीर्थक्षेत्र जीर्णोद्वारक महामुनिराज मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज का वर्ष 1992 में समीपस्थ जिला अशोकनगर में चातुर्मास संपन्न हुआ। वहां मुनिश्री ने विश्व के इतिहास में पहली बार निकलने वाले सप्त गजरथ महोत्सव का आयोजन भी कराया था। इसी मौके पर मंदिर ट्रस्ट कमेटी और समाजजनों ने मुनिश्री से आग्रह किया कि वह बजरंगगढ़ जी आएं और प्रतिमाओं में जो क्षरण हो रहा है उसका उपाय बताएं। चातुर्मास के बाद विहार करते हुए मुनिश्री बजरंगगढ़ आए। मुनिश्री ने यहां भगवान के चरणों में प्रार्थना की और जाना कि क्षेत्र के गर्त में जाने की वजह क्या है। मुनिश्री ने मूलनायक भगवान के सामने ध्यान लगाया और जाना कि ऐसी चमत्कारिक प्रतिमाएं और कहीं नहीं हैं। इनमें असीमित शक्ति है पापों का क्षरण करने, इनमें असीमित शक्ति है भक्तों के दुख दूर करने की। तभी मुनिश्री ने अपने ध्यान और योग के बल पर जाना और फिर बिंबोद्वार के बारे में समाजजनों को बताते हुए समूचित प्रबंध करने की बात कही। मुनिश्री के मार्गदर्शन और सानिध्य में प्रतिमा जी का बिंबोद्वार किया गया। दृष्टि दोष को दूर करने का प्रयास किया। सामने जो वेदी स्थित थी उसे भी हटाया गया। इसके बाद मुनिश्री का मंगल विहार राजस्थान की ओर हो गया। कमेटी मार्गदर्शन लेती रही और बार- बार मुनिश्री को गुना में चातुर्मास करने का आग्रह करती रही। सभी की एक ही भावना थी कि मुनिश्री के कदम इस धरा पर पड़ जाएं तो यह क्षेत्र भी आसमान को छूने लगेगा।

गुना के लिए चमत्कार भरा रहा चातुर्मास 2013

भक्तों की लंबी पुकार की आखिरकार सुनवाई हुई और गुना वालों को वर्ष 2013 में मुनिश्री का चातुर्मास मिल गया। मुनिश्री जिस पाषाण को छू देते हैं वह पाषाण पूज्य हो जाया करता है। उनके चरण जिस धरा पर पड़ जाते हैं वह धरा तीर्थ बन जाया करती है। जिस तीर्थ को वह छू देते हैं वह तीर्थ विश्व में प्रसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। हाल ही में उन्होंने ढाई लाख की आबादी वाले गुना नगर में पूरे 6 माह तक अपने अमृत वचनों की वर्षा की।

17 जुलाई 2013, वह पवित्र पावन तारीख है जिस तारीख में जगतपूज्य मुनि पुंगव श्री सुधासागर महामुनिराज के चरण बजरंगगढ़ की धरा पर पड़े। ऐसा लगा जैसे यहां विराजमान श्री 1008 भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरनाथ, मुनिश्री के ही आगमन की प्रतीक्षा कर रहे हों।

जीर्णशीर्ण स्थिति में पहुंच चुका मंदिर, दीवारों पर जमी काई और डेढ़ से दो फुट मोटाई होने के बाद भी बारिश का पानी सहन नहीं कर पा रही छत, बारिश होते ही छत से रिसता हुआ पानी, दरवाजों के ऊपर लगे पत्थर, कहीं प्लेट लगाकर दीवार को गिरने से बचाने का छदम प्रयास करते पत्थर, दीवारों से झड़ता प्लास्टर ने मुनिश्री को कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। जैसे ही मुनिश्री गुफा में विराजमान भगवान श्री शांतिनाथ, कुंथुनाथ और अरहनाथ जी के दर्शन करने पहुंचे तभी उन्हें एक असीम ऊर्जा की अनुभूति हुई। इतनी मनोहारी अति प्राचीन प्रतिमाएं होने के बावजूद क्षेत्र गर्त में ही पड़ा है। मुनिश्री ने ध्यान लगाया और देखा कि क्या किया जा सकता है। इस तीर्थक्षेत्र को ऊंचाइयां कैसे दी जा सकती हैं। सभी पहलुओं पर विचार किया गया। देश के तमाम पुरातात्विक ज्ञाता, विद्वान आए, आर्किटेक्चर इंजीनियरों ने निरीक्षण किया। अंतत: तय हुआ कि जिनालय भवन की छत जो काफी दिनों से टपक रही है और उसका टपकना बंद नहीं किया जा सकता है। दीवारें जो मोटाई लिए हुए तो हैं लेकिन उम्र पूरी कर चुकी हैं। जो लंबा समय बर्दाश्त नहीं कर पाएंगी। क्योंकि चूने की एक निश्चित उम्र होती है। दीवारों से प्लास्टर झड़ रहा है। अंतत: तय किया गया कि मूलनायक भगवान का जिनालय ऐसा हो जिससे दृष्टिदोष पूरी तरह से दूर हो जाए और सडक़ से ही श्रीजी के दर्शन आमजन को उपलब्ध हा जाएं। इसके बाद प्रताप छात्रावास में प्रवचन सभा के दौरान कमेटी की ओर से प्रस्ताव लाया गया कि मंदिर का निर्माण कराया जाना है। मुनिश्री सुधासागर महाराज के सानिध्य में हुई यह बात भक्तों ने हाथों हाथ ली और फिर शुरू हुआ भव्य मंदिर का निर्माण।

मुनिश्री ने दिया “पुण्योदय” नाम

जीवों के पुण्य को बढ़ाने की विलक्षण क्षमता को देखकर यहां वर्ष 2013 में आए मुनिपुंगव श्री 108 सुधासागर जी महाराज ने इस क्षेत्र का नाम “पुण्योदय तीर्थ” दिया इस प्रकार से इस क्षेत्र का नया विस्तृत नाम “अखिल भारतीय श्री 1008 शांतिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय तीर्थक्षेत्र, बजरंगगढ़ (जैनागढ़)” रख दिया गया है । तभी से यह क्षेत्र विकास की ऊँचाइयों को छूता हुआ जगत प्रसिद्ध हो रहा है। यहां आने वाले हर एक जीव के पुण्य कर्मों में असीमित वृद्वि होती है। यही वजह है कि यहां रोजाना सैंकड़ों भक्त एक साथ सामूहिक रूप से अभिषेक, शांतिधारा और संगीतमय पूजा अर्चना कर भगवत भक्ति करते हैं। प्रात:काल तो मानो ऐसा लगता है जैसे हम किसी कृत्रिम चैत्यालय में आ गए हों और सौधर्म इंद्र सभी जातियों के देवेंद्रों के साथ मिलकर भगवत भक्ति कर रहा हो।

क्षेत्र अब अखिल भारतीय हुआ

जैसे ही बात धर्मसभा में आई वैसे ही वहां विराजित मुनिश्री सुधासागर जी महाराज ने कहा कि यह क्षेत्र अब अकेले गुना जिले का नहीं बल्कि संपूर्ण भारत वर्ष का होगा। भारत का कोई भी दिगम्बर जैन श्रावक इस ट्रस्ट का संरक्षक, परम संरक्षक और शिरोमणि संरक्षक बन सकता है। इसके बाद ही इस क्षेत्र का नामकरण “अखिल भारतीय श्री 1008 शांतिनाथ दिगंबर जैन पुण्योदय अतिशय तीर्थक्षेत्र बजरंगगढ़ (जैनागढ़)” रखा गया।

विश्व में पहली बार हुआ 24 तीर्थंकर विधान

मुनिश्री के सानिध्य में गुना के प्रताप छात्रावास मैदान में वो हुआ जिसे देखकर समूचा विश्व आश्चर्यचकित रह गया। यहां 1 जनवरी से 2014 से चौबीस तीर्थंकर समोशरण विधान का आयोजन रखा गया। इसके लिए 24 समोशरण बनाए गए। पहली बार भक्तों ने समोशरण की अष्टम भूमि में बैठकर पूजा की। अब तक सिर्फ थर्माकोल के समोशरण बनते देखे थे। लेकिन मुनिश्री ने वह सौभाग्य भक्तों को दिया जो कि विश्व में एक रिकार्ड बन गया। विधान के समापन में गुना से 24 पालकियों के साथ भव्य गजरथ यात्रा निकाली गई जो 7 किमी पैदल चलती हुई पुण्योदय अतिशय तीर्थ क्षेत्र, बजरंगगढ़ पहुंची। यहां शांतिनाथ कुंथुनाथ अरनाथ भगवान् का महामस्तिकाभिषेक करने का पुण्य अवसर भक्तो को मुनिश्री के सानिध्य में मिला ।

संत निवास

“पुण्योदय अतिशय तीर्थक्षेत्र” पर जैन संतो के लिए संत निवास का निर्माण कराया गया है ।

आवास निलय

“पुण्योदय अतिशय तीर्थक्षेत्र” पर 400 यात्रियों के रुकने की पर्याप्त व्यवस्ता है एवं क्षेत्र पर यात्रियों के रुकने के लिए नवीन धर्मशाला “श्री गंभीरसागर निलय” एवं “श्री धैर्यसागर निलय” का निर्माण कार्य पूर्ण होने पर है। कमेटी का लक्ष्य शीघ्र से शीघ्र 1000 लोगों की रुकने की व्यवस्ता करने का है । क्षेत्र पर भोजनशाला एवं स्वल्पाहार की भी व्यवस्ता उपलब्ध है।