प्राचीन काल में पूर्वजो के समक्ष, अनेक अतिशयकारी घटनायो का यह क्षेत्र साक्षी रहा है। जैन परंपरा और जैन सिद्वांत के अनुसार तीर्थंकर वीतराग भगवान द्वारा कभी भी इस प्रकार की घटनाये नहीं होती। वीतराग तो राग से रहित होकर, पर से भिन्न यह परमात्म स्वरुप वीतराग आत्मा है । जिसे अतिशय जैसे चमत्कारों की प्रभावना से कोई भी स्वार्थ नहीं है। किन्तु यह चमत्कारिक समस्त अतिशय तो वीतराग भगवान के सेवक देव-देवांगनाये ही श्रावक की भक्तिभाव देखकर किया करते है। और इसी परंपरा के कारण जहाँ जहाँ ऐसे चमत्कार होते है वहां के तीर्थ क्षेत्र “अतिशय क्षेत्र” कहलाते है।

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दसलक्षण पर्व के दिनों में कई बार भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ व अरनाथ के समक्ष देव-देवांगनाये भगवान की भक्ति, भजन एवं मधुर वाध्य यंत्रो की ध्वनि को कई बारनिकटवर्ती निवासियों ने मध्यरात्रि में सुनी है जिसकी मधुर झंकार सुनकर आसपास के लोग बड़े आश्चर्य में रहे जाते है ।

सम्वत 1943 जब कि “जैनागढ़” में पालकी निकली जा रही थी, सुनसान मंदिर जान कुछ आततायियो ने मंदिर में प्रवेश कर गर्भगृह स्थित मूर्तियों को क्षति पहुँचाने का दुस्साहस किया तो तत्काल अग्निवर्षा होने लगी और आततायी अपने प्राण बचाकर तुरंत भाग गए।

सम्वत 1961-62 में यहाँ क्षेत्र पर भागचंद नाम का बागवान कार्यरत था। भगवान की सेवा और मंदिर का कार्य बड़े लगन से किया करता था। एक रात्रि को मंदिर की सफाई तथा अपने कार्य से थककर मंदिर जी के अन्दर आराम हेतु लेट गया और लेटते ही उसे निंद्रा आ गयी। अचानक देवों ने उसे अपने सोये हुये अन्दर के स्थान से बाहर लाकर सुला दिया। यह आश्चर्य देख भागचंद बागवान चकित रह गया और इस बात को सुनकर अन्य लोग भी आश्चर्य में रह गए।

दिनाकं 17-10 -1971 को जब यहाँ मकराने के कारीगर बाहर का तिवारा निर्माण व फिटिंग का कार्य कर रहे थे। दिन के लगभग 3 बजे मुख्य मंदिर के चबूतरे पर उस कारीगर द्वारा एक कुत्ते को लाठी से भागने पर, कुत्ते का प्राणांत हो गया। कुत्ते के प्राणांत होते ही ग्राम के अनेक लोग उस कारीगर के विरोध में झगडा करने पर आ गए। बात सही थी कुत्ते को जान से मरने वाली बात किसको सहन हो सकती थी। फिर भी निर्माण कमेटी के समझाने पर बीच बचाव हुआ। कुत्ते के शव पर मख्खियाँ लग रही थी, ऑंखें खोल दी थी और मुहँ फाड़ दिया था। यह देखकर निर्माण कमेटी के सदस्य बहुत दुःखित थे कि भगवान शांतिनाथ के मंदिर के सामने चबूतरे पर इस प्रकार की घटना सुनकर दुनिया क्या कहेगी। बहुत कुछ कह सुनकर उस कुत्ते के शव को नदी के किनारे झाड़ी के पास फिकवा दिया ।

सांय हो चुकी थी रात्रि के गुजरते ही सुबह होने आया था, उन्ही कारीगरों में से एक जुम्मन कारीगर नदी की और शौचादि हेतु गया, तो सामने ही उस शव को देखा तो पाया की मृत हो चुके कुत्ते की सांसे चल रही थी । और ठीक आधे घंटे बाद वह कुत्ता पुनः मरणावस्था से लौटकर भगवान शांतिनाथ के शंतिद्वार पर आ गया। यह चमत्कारिक अतिशय देख आसपास के सभी ग्रामवासी आश्चर्यचकित रह गए। ऐसे अपूर्व अतिशय दिन रात होते रहते है।

जैसा की ऊपर कहा गया है की तिवारे का फिटिंग व निर्माण कार्य चालू था। एक पत्थर का लेन्टर्न (गाटर) जिसकी लम्बाई 11 फीट और चौड़ाई 1.5 फीट और मोटाई 1 फीट थी, उसे ऊपर चढ़ाने का प्रयत्न कर रहे थे। लेन्टर्न (गाटर) पत्थर का इतना ज्यादा भारी था कि 16 व्यक्ति लगे हुए थे। तथा सहारे के लिए मजबूत जेको से काम लिया जा रहा था । ऊपर जब लेन्टर्न (गाटर) मजदूरों के कन्धों पर था तो यकायक 22 फीट ऊपर से उसके गिरने की स्थिति बन गई । किन्तु भगवान शांतिनाथ की जय जयकार ने एवं उनके नाम की जाप ने लेन्टर्न के गिरने से समस्त कार्यरत लोगों को जान से बचा लिया।

मुग़ल शासन काल में अनेको बार मूलनायक प्रतिमाओ को खंडित करने के लिए इस क्षेत्र पर कई तरह के आक्रमण हुए है और उस समय भी कई अतिशय इस क्षेत्र पर हुए है । मुग़ल शासन काल में तो अनेको प्राचीन जैन तीर्थो पर औरंगजेब द्वारा मंदिरों एवं प्रतिमाओ को खंडित करने का दुसाहस किया गया और इसी बीच जैन संस्कृति के अनेक तीर्थ क्षेत्रो पर अतिशय होते रहे है ।

सम्वत 1992 की बात है, क्षेत्र पर उस समय पानी बैलगाड़ियों से लाया जाता था, पानी की सम्पूर्ण ग्राम में बहुत ज्यादा समस्या थी। उस समय क्षेत्र में स्थित कुवां में खुदाई का कार्य चल रहा था। कुंवे की खुदाई के लिए अत्यंत प्रयासों के बाद भी खुदाई करने वालों को पानी निकलने में सफलता नहीं आ रही थी और 200 फिट से भी अधिक खुदाई के बाद भी पानी न निकल सका। इसी समय अशोकनगर के चातुर्मास करने के उपरांत क्षेत्र पर मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज का क्षेत्र पर आगमन हुआ।

तब एक जैनोत्तर समाज ने व्यक्ति ने मुनिश्री को बताया की कुवें की खुदाई करने से कोई फायदा नहीं होगा क्यूंकि बजरंगढ़ पूर्व से ही एक ब्राह्मण संत द्वारा पानी के लिए शापित है। पुरे बजरंगढ़ में उस समय पानी की बहुत ज्यादा समस्या थी लेकिन बजरंगढ़ की सीमा समाप्त होने के बाद चारों और पानी की कमी न थी। कहा जाता है की एक ब्राह्मण संत बजरंगढ़ से गुजर रहे थे और एक महिला से पानी पिलाने के लिए निवेदन किया लेकिन उस महिला ने पानी पिलाने से मन कर दिया तो ब्राह्मण संत ने इसे तिरस्कार के रूप में लेकर पुरे बजरंगढ़ को पानी के लिए श्राप दे दिया।

यह बात सुनकर सभी और ज्यादा निराश हुए क्यूंकि 200 फिट तक कुवां खोदने के बाद बजरंगढ़ के पानी के लिए श्रापित होने की बात पता चली। तब बजरंगढ़ की कमेटी ने मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी के चरणों में समाधान हेतु निवेदन किया। मुनिश्री को भी यह बात समझ में नहीं आ रही थी की इतने बड़े अतिशय क्षेत्र पर शांतिनाथ भगवान के ही क्षेत्र पर ऐसी समस्या कैसे हो सकती है लेकिन मुनिश्री का मन यह मानने तो तैयार न हुआ और मुनिश्री ने शांतिनाथ भगवान के चरणों में 2 घंटों तक तपस्या की और एक श्रीफल को मूलनायक शांतिनाथ भगवान के चरणों को स्पर्श करा कर कमेटी वालों को दे दिया और उन्हें और खुदाई करने को कहा। बस फिर क्या था श्रीफल देने के बाद मात्र कुछ ही फिट की खुदाई पर पानी ही पानी निकला और इतना ज्यादा पानी निकला की सिर्फ इस अतिशय क्षेत्र नहीं सम्पूर्ण बजरंगढ़ की पूर्ति कर सके इतना पानी निकला। खुदाई करने वाले, कमेटी मेम्बर, श्रावक और क्षेत्र पर उपस्थित एक एक व्यक्ति के चहरे पर खुशी का ठिकाना न था।

सभी ने इसे मुनिपुंगव श्री सुधासागर जी महाराज के आगमन का अतिशय माना और नमोस्तु कर मुनिश्री का आभार प्रकट किया लेकिन मुनिश्री ने कहा की यह मेरा नहीं शांतिनाथ भगवान के चरणों का अतिशय है जो की पानी के लिए श्रापित क्षेत्र अब श्राप मुक्त हो गया। मुनि श्री आज भी अपने प्रवचनों में कहते है मैंने तो सच्ची श्रद्दा के साथ शांतिनाथ भगवान का ध्यान किया था तभी यह चमत्कार हुआ ।

बजरंगढ़ की पहली कमेटी के अनुसार शाम के समय मंदिर के निकट चबूतरे पर (वर्तमान भोजनशाला के सामने) कुछ लोग सफ़ेद वस्त्र पहने बैठे हुए थे शाम के समय उनके सफ़ेद वस्त्रों पर अपने आप केसर के छींटे आ गए उन्होंने बताया था की वहां केसर वर्षा हुई थी। अन्य गुना निवासियों ने भी समय समय पर केसर की वर्षा के विषय में बात की है ।

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यह क्षेत्र वैसे तो पूर्व से ही अतिशययुक्त रहा है और आज भी है । प्राचीन काल में पूर्वजो के समक्ष अनेक आश्चर्यजनक घटनाये यहाँ हुई है जो की अनगिनत है । यूँ हो हमेशा ही अनेकानेक यात्री क्षेत्र के दर्शन कर अपनी मनोकामना पूरी होने की इच्छा करते है और यदि वह इच्छाये शुभ हैं तो अवश्य पूरी होती है। ह्रदय में आत्मविश्वास हो और कितना ही जटिल कार्य क्यों न हो, एक बार “पुण्योदय अतिशय तीर्थक्षेत्र” के वीतराग भगवान शांतिनाथ, कुंथुनाथ व अरनाथ का नाम लेने से व ध्यान करने मात्र से सब कार्य सफल बन जाते है ।